वो सुबह थी अजीब… कुछ था उस कोहरे के पीछे , शायद सूरज था रो रहा बादलों के पीछे | सुकून की नींद, टूटी थी अचानक, हो गया छल झपकते ही पलक | हवा थी खुश्क और गिर रहा था पारा, मुझे लूटा, ले के कोहरे का सहारा | बारिश नहीं, आंसू रहे थे छलक, यादों की डोर की मन में थी झलक । दिल की बातें, दिल में ही गयी रह, आँखों से समंदर रहे थे बह। बहुत जल्दी में थे आप, शायद प्रभु को भी थी आपके प्रेम की आस | इस जल्दी ने लिया मेरा हक़ मुझसे छीन, आपको आराम देने से रह गया विहीन | आज भी है आपके स्पर्श का एहसास, हमेशा रहता है मेरे ही आस पास । आते हो ख़्वाबों में, आज भी, फिर खो जाते हो कहीं, अचानक ही। सब है अनिश्चित, उस सुबह आया समझ, जो आज है, अभी है, वही है सच | अगले ही पल क्या हो, ये कौन है जानता आज ख़ुशी, तो कल दुःख का हो सामना | वो सुबह थी तो अजीब, पर दे गयी एक सबक| बस आज ही अपना है, ये ही है सबब |

Super poem.
very nicely rhyme and super message.
keep dreaming…keep writing
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Thank you so much for the encouraging words. I am happy you liked it.
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Poem has the great message and the truth of life… Indeed appreciable.
Keep writing Sir.
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Thank you so much for the appreciation, it encourages me to write more. I am happy you could relate with the message.
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